महज 28 जी हाँ अट्ठाईस साल की उम्र वाले अभिषेक भाई झटके पर झटके :) दिये जा रहे हैं। मुमकिन है आप में से कई लोग अभिषेक शुक्ला को पढ़ चुके होंगे। मैंने सब से पहले जब उन्हें पढ़ा तो माथापीट लिया [भाई जो सच है वही बता रहा हूँ]; उस के बाद उन्हें बार-बार पढ़ा तो उन की बातें समझ में आने लगीं। अब कुछ-कुछ समझने लगा हूँ उन के तसव्वुर को। ये हक़ीक़त है कि जब तक हम ख़ुद को शायर की कल्पना के नज़दीक नहीं ले जाते [यहाँ बे-बहरे मिसरे और फ़ुजूल बातों को एक्सेप्शन माना जाये], तब तक उस के बयान का पूरा लुत्फ़ उठा ही नहीं सकते। अभिषेक की अपेक्षाकृत रूप से एक आसान ग़ज़ल आज आप लोगों को पढ़वाता हूँ:-
अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है
मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है
इख़्तियार - अधिकार, मौजें - लहरें, रवानी - बहाव, वजूद - अस्तित्व
मैं और मेरी तरह तू भी इक हक़ीक़त है
फिर उस के बाद जो बचता है वो कहानी है
तेरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं
तेरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है
ज़रा भी दख़्ल नहीं इस में इन हवाओं का
हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है
दख़्ल - हस्तक्षेप, मस्लहतन - [किसी] कारण वश
ये ख़्वाब-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम
हर एक चीज़ मेरी ज़ात में पुरानी है
ख़्वाब-गाह - शयन-कक्ष [Bedroom], इश्क़-ए-क़दीम - पुरातन प्रेम, ज़ात - नस्ल के सन्दर्भ में
वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुजरा था
तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है
तर्जुमानी - अनुवाद
:- अभिषेक शुक्ला
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
1212 1122 1212 22
बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
1212 1122 1212 22
बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ